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अनुवाद में कहीं मतलब खो बैठे

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भैंस के आगे बीन बजाना: यह कहावत इस हफ़्ते के वार्तालाप के लिए बिल्कुल सही है. अगर हम इस कहावत को अँग्रेज़ी में उल्था करें तो वह ठीक नहीं सुनाई देगा. इसी का समकक्ष अँग्रेज़ी में होगा, Pearls before swine. हिंदी में इसका मतलब होगा सूअर के सामने मोती. लेकिन हिंदी में यह कभी नहीं कहा जाएगा. यह इसलिए क्योंकि, हमारी समझ में भैंस सूअर से ज्यादा बुद्धू है. लेकिन आखिर में दोनों कहावतों की सीख यही है कि जो कुछ भी हम कहते हैं, वह सुननेवाले को ध्यान में रख कर कहना चाहिए.

कहा जाता है कि भाषा संस्कृति का नक्शा है. भाषा बताती है कि उसके लोग कहाँ से आए है और किस दिशा जा रहें हैं. कोई भी भाषा में लिखें गए लेखन अपनी संस्कृति को प्रतिबिंबित करती है, उसके इतिहास का विचारण करती है, और उसमें पलने वाली धारणा भी दिखाई देती है. इस लिए कोई शब्द जो एक संस्कृति में जन्मी हो वह दूसरी भाषा जिसका इस संस्कृति से कोई लेना देना न हो, उसमें बदलना मुश्किल हो जाता है.

लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि किसी शब्द को कोई और भाषा में कहा ही नहीं सकता. उदाहरणार्थ, तकनीकी शब्द जो कंप्यूटर और आय.टी. के संबंध में सुनाई देते है इनका उल्था नहीं किया जाता है. इन शब्दों को वैसे ही देव नागरी लिपि में लिखा जाता है. इसका कारण सिर्फ इतना है कि इनके उल्था करने में बहुत वक्त और श्रम लगता है. हिंदी के कुछ शब्द भी कभी अनुवाद नहीं किए जाते, जैसे ´चार पाई´. इसे अंग्रेज में भी Charpoy ही कहा जाता है. इसे अँग्रेज़ी में cot या bed भी कह सकते है, लेकिन इन शब्दों में ´चार पाई´ वाली बात नहीं रहेगा.

समस्या यह है कि कुछ शब्दों को अनुवाद किया ही नहीं जा सकता. हम शब्द का संदर्भ बता सकते है, या फिर शब्द की जगह वाक्य लिख सकते है. लेकिन इससे साहित्य का रस और लहजा चला जाता है. इस तरह का लेखन पढ़ने में वह मज़ा नहीं जैसे मूल लेखन में हो.

अंग्रेज़ी में कहे जानेवाले कुछ वाक्य जब हिंदी में अनुवाद करें तो बड़े मजेदार लगते है:

What’s up? — ऊपर क्या है?
You’re kidding! — तुम बच्चे बना रहे हो!
Are you nuts? — क्या आप अखरोट हैं?
Keep in touch…… छूते रहो

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