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भारत की भाषाएँ

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जर्मनी में आने से पहले मुझे लगता था, शायद कुछ अजीब सा महसूस होगा की दूसरे लोग क्या कह रहे हैं इसका मुझे एक लफ्ज़ भी ना समझे. लेकिन यहां आने के बाद मैं समझ गयी – इससे पहले कितनी बार मैं ऐसे जगह में रही हूँ, जिस जगह की भाषा मुझे आती नहीं. और यह सब जगह, हमारे हिंदुस्तान में ही!

ऐसे दुनिया में बहुत कम प्रांत हैं, जहां इतनी भाषाएँ सुनाई देती हैं. हमारे देश में ज़्यादातर लोग तीन भाषाएँ जानते हैं – हिंदी, उनकी मातृभाषा (जो कई लोगों को लिये हिंदी नहीं) और अंग्रेज़ी. इससे आगे नौजवान लोगों की कुछ अलग ही भाषा बनती है – हिंदी, अंग्रेज़ी और उनकी मातृभाषा का एक अनोखा मिश्रण. शायद महाविद्लयों के शिक्षक यह भाषा को भाषा को नाम से पुकारने के लिये राज़ी नहीं, लेकिन बात तो सच है कि जवान लोगों की यही है ज़बान.

हिंदुस्तान की भाषाएँ एक ही जन्म की नहीं. बहुत भारतीय भाषाओं का जन्म संस्कृत से हुआ है, मगर सब नहीं. उत्तर हिंदुस्तान की कई भाषाओं में उर्दु और फारसी की कुछ बातें दिखाई पड़ती है. इतना कि दिल्ली की हिंदी और मुंबई की हिंदी में अनेक फ़र्क आ गये हैं. दिल्ली की हिंदी में पंजाबी और उर्दु के शब्द ज़्यादा है, और जितना हम और ज़्यादा दक्षिण की तरफ देखे, उर्दु का प्रभाव कम दिखाई देता है.

हिंदुस्तानी भाषाओं की माँ अगर हम संस्कृत समझे, तो तमिल भी हिंदुस्तानी भाषाओं की माँ है. दक्षिण भारत की ती बड़ी भाषाएं हैं तमिल, तेलुगू और मलयालम. तमिल भाषा दो हज़ार सालों से अधिक पुरानी है. दक्षिण भारत की भाषाओं में तमिल का प्रभाव जोरदार रहा है.

हमारे देश में प्रधान भाषाएँ २२ हैं. इस बात का हमे नाज़ है, जैसे होना ही चाहिये. पर दुख की बात यह है, कि क्या हम हमारी अपनी भाषाओं का महत्व जानते हैं? आज की दुनिया में सारे व्यवहार अंग्रेज़ी में चलते हैं. यह देखकर सब लोग जल्दी से जल्दी अपने बच्चों को अंग्रेज़ी सिखाने में लगते है. अंग्रेज़ी सीखना तो अच्छी बात है, ज़रूर हमारे बच्चों को अंग्रेज़ी आनी चाहिये, लेकिन हमारी भाषाओं का क्या? अंग्रेज़ी सीखना में हम अपनी खुद की भाषाएँ बलिदान क्यों करते हैं?

भारत भाषों का देश है. मैं आशा रखती हूँ कि आनेवाले बरसों में भी हमारी अलग भाषाएँ हमारे भारत को रंग लायें!

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