लड़की को कैसे (नहीं) पटाया जाता

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शायद कसूर हमारी बॉलिवुड फ़िल्मों का है। हमेशा वही कहानी – लड़का कैसा भी हो, उसकी गुस्ताखी पर लड़की कितनी भी हैरान हो जाए – आखिर में हिरो के बोलने के ढंग के बलबूते पर लड़की पट जाएगी। सब लोग जानते हैं कि ऐसा ही होगा – दर्शकों को पता है, लड़के को पता है, बस बेचारी लड़की नही जानती।

और संगीत का भारत में हमेशा बड़ा महत्व रहा है। तब ज़ाहिर सी बात है कि अगर कोई आशिक़ अपनी लड़की की खोज में है, उसका दिल तक पहुंचने का रास्ता संगीत से ही होगा।
हाँ, कसूर शायद बॉलिवुड का है। तभी तो बंबई के रासतों पर इतने सारे हिरो पड़े रहते है, अपनी हिरोइन ढूंढते हुए। कोई इन्हें बता दें कि लड़की के कान में बोलिवुड गाना गुनगुनाकर लड़की प्यार में नहीं पड़ जाती!

बंबई में ऐसे बोलिवुड आशिक़ दो तरह के होते हैं; गानेवाले और गुगुनानेवाले।

गुगुनानेवालों का तरीका कुछ ऐसा होता है: छोटे कोने में छिपे रहो, सामने से जाने वाली हर लड़की पर गौर की नज़र रखो। पसंद की लड़की मिल जाए तो (और ऐसी पसंद की लड़की मिलने में ज़्यादातर पाँच मिनटों से अधिक वक़्त नहीं लगना चाहिए) अपने कोने से धीरे से निकल जाओ। लड़की पास आने पर एकाएक अपना गुगुनाना शुरू करो। (अगर गाना पिछले सात दिनों में लगातार रेडियो पर रहा है, तो और भी अच्छा।) फिर देखो कि लड़की कैसे और भी तेज़ भाग जाती है।

गानेवालों का तरीका कुछ अलग होता है। फ़र्क बस इतना ही कि यह गाना गुगुनाते नहीं बल्कि पूरा गाने ही लगते हैं। इनका जीवन मंत्र है “गाना आये या ना आये गाने चाहिए।” फिर क्या फ़र्क पड़ता है कि लड़की को गायक के दिल की अवस्था के बारे में और जानना है या नही?

पिछले महिनों के टॉप पाँच गाने –

  • देसी गर्ल (चाहे लड़की ने पहना हो सलवार या जीन्स)
  • आँखों में तरी
  • जाने क्यों
  • गुज़ारिश
  • मैं अगर कहूं

इन आशिक़ों से सीखिए – लड़कियों को कैसे नही पटाया जाता!

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